मुख्य-पृष्ट
वैवाहिक कार्यक्रम
वैवाहिक योजना
वैवाहिक आवश्यकता
वैवाहिक गीत
वैवाहिक स्रोत
वैवाहिक उपयोगी बातें
1. कुछ उपयोगी बातें
2. विवाह का पंजीकरण
3. जन्म- कुण्डली मिलान
4. सात वचनों की डोर
5. सोलह श्रृंगार
6. सात शत्रु
7. पत्रिका मिलान
8. एक ही गौत्र में विवाह?
9. विवाह संस्कार
10. विवाह संस्कार कर्म
11. विवाह योग के कारक
12. विवाह योग
13. विवाह का विज्ञान
14. विवाह के उपाय
15. सप्तपदी
16. कन्यादान - शिक्षा एवं प्रेरणा
17. कन्यादान क्या, क्यों और किसे?
वैवाहिक हंसिकाएं
वैवाहिक डाऊनलोड
वैवाहिक समाचार
वैवाहिक रोचक रीति-रिवाज
वैवाहिक शब्दकोश
अन्य उपयोगी बातें
हमारी सेवाऐं
हमारे बारें में

सप्तपदी

जिस विवाह में सप्तपदी होती है वो वैदिक विवाह कहलाता है. सप्तपदी वैदिक विवाह का अभिन्न अंग है. इसके बिना विवाह पूरा नहीं माना जाता, सप्तपदी के बाद ही कन्या को वर के वाम अंग में बैठाया जाता है ---"यावत्कन्या न वामांगी तावत्कन्या कुमारिका" जब तक कन्या वर के वामांग की अधिकारिणी नहीं होती उसे कुमारी ही कहा जाएगा. माता पिता कन्यादान भी कर दें, भाई लाजा होम भी करवा दें, पाणिग्रहण संस्कार भी हो जाए, लेकिन जब तक सप्तपदी नहीं होती, तब तक वर और कन्या पति-पत्नी नहीं बनते. और वैदिक विवाह में अंतिम अधिकार कन्या को ही दिया गया है. माता-पिता भले ही कन्यादान कर दें, भाई लाजा होम करवा दें, लेकिन जब तक सप्तपदी के सातों वचन पूरे नहीं हो जाते और कन्या वर के वाम अंग में नहीं बैठ जाती. तब तक विवाह पूरा माना ही नहीं जाएगा. और आधुनिक विचार धारा वाले चाहे इसे ढ़कोसला कहें या पुरातन पंथी लेकिन उन्हें भी ये जान कर हैरानी होगी कि इसमें दोनों बराबर हैं और सातवें पद के बाद दोनों सखा बन जाते हैं. दुनिया की किसी विवाह पद्धति में ऐसा बराबर का रिश्ता नहीं है.

वैदिक विवाह पद्धति हज़ारों साल पुरानी है, ऋग्वेद और अथर्ववेद इसके आधार हैं. चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है. ऋग्वेद के दसवें मंडल का 85वां सूक्त और अथर्ववेद के 14वें कांड का पहला सूक्त विवाह सूक्त हैं. ऋषि मुनियों ने इन्हीं सूक्तों के आधार पर वैदिक विवाह पद्धति तैयार की. वैदिक विवाह को सर्वश्रेष्ठ माना गया है. क्योंकि ये विवाह माता पिता की सहमति से, नाते रिश्तेदारों, इष्ट मित्रों और गुरूजनों के आशीर्वाद से होता है. और देवी देवता इसके साक्षी रहते हैं. वैदिक विवाह के कईं भाग हैं. सप्तपदी को सनातन धर्म में सात जन्मों का बंधन माना गया है.

---- पहले पद में वर कन्या से कहता है ---ऊं इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 1।।
वर कहता है --- हे देवि ! तुम संपत्ति तथा ऐश्वर्य और दैनिक खाद्य और पेय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए पहला पग बढ़ाओ, सदा मेरे अनूकूल गति करने वाली रहो. भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें, जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...

---- ऊं ऊर्जे द्विपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 2 ।।
---- हे देवी ! तुम त्रिविध बल तथा पराक्रम की प्राप्ति के लिए दूसरा पग बढ़ाओ. सदा मेरे अनूकूल गति करने वाली रहो. भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें, जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...

----ऊं रायस्पोषाय त्रिपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 3 ।।
-----------हे देवि ! धन संपत्ति की वृद्धि के लिए तुम तीसरा पग बढ़ाओ, सदा मेरे अनूकूल गति करने वाली रहो. भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें, जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...

---- ऊं मयोभवाय चतुष्पदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 4।।
.... हे देवि ! तुम आरोग्य शरीर और सुखलाभवर्धक धन संपत्ति के भोग की शक्ति के लिए चौथा पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो, भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें, जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...

--- ऊं पशुभ्यो: पंचपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 5 ।।
--- हे देवि ! तुम घर में पाले जाने वाले पांच पशुओं, (गाय, भैंस, बकरी, हाथी और घोड़ा) के पालन और रक्षा के लिए पांचवा पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें, जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...

---- ऊं ऋतुभ्य षट्पदी भव सा मामुनव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 6 ।।
---- हे देवि ! तुम 6 ऋतुओं के अनुसार यज्ञ आदि और विभिन्न पर्व मनाने के लिए और ऋतुओं के अनुकूल खान पान के लिए छठा पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो, भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें, जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...

--- ऊं सखे सप्तपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 7 ।।
---- हे देवि ! जीवन का सच्चा साथी बनने के लिए तुम सातवां पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो, भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें, जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...

रामेश्वर दास गुप्त धर्मार्थ ट्रस्ट द्वारा वैदिक विवाह पद्धति में तो सरल भाषा में सातों पदों को कुछ ऐसे लिखा गया है---

--- अन्नादिक धन पाने के हित, चरण उठा तू प्रथम प्रिये ।।
--- और दूसरा बल पाने को, जिससे जीवन सुखी जियें ।।
--- धन पोषण को पाने के हित, चरण तीसरा आगे धर ।।
--- चौथा चरण बढ़ा तू देवि, सुख से अपने घर को भर ।।
--- पंचम चरण उठाने से, तू पशुओं की भी स्वामिन बन ।।
---- छठा चरण ऋतुओं से प्रेरक, बन कर हर्षित कर दे मन ।।
---- और सातवां चरण मित्रता के हित आज उठाओ तुम ।
मेरा जीवन व्रत अपनाओ, घर को स्वर्ग बनाओ तुम ।।

सप्तपदी पूरी होने के बाद कन्या को वर के वाम अंग में आने का निमंत्रण दिया जाता है, लेकिन वामांगी बनने से पहले कन्या भी वर से कुछ वचन लेती है ----

--- तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान यदि मेरे साथ करोगो तो मैं तुम्हारे वाम अंग आऊंगी ।
---- यदि देवों का हव्य, पितृजनों को कव्य मुझे संग लेकर करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आऊंगी ।
--- परिजन, पशुधन का पालन रक्षण भार यदि है आपको स्वीकार, तो मैं वाम अंग में आने को तैयार ।
---- आय-व्यय, धन-धान्य में मुझ से यदि करोगो विचार, तो मैं वाम अंग में आने को तैयार ।
--- मंदिर, बाग-तड़ाग या कूप का कर निर्माण पूजोगे, यदि तो मुझे वामांगी निज जान ।
--- देश-विदेश में तुम क्रय-विक्रय की जानकारी मुझे भी देते रहोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आऊंगी ।
---- सुनो सातवीं शर्त यह, परनारी का संग नहीं करोगे तो आऊंगी, स्वामिन् वाम अंग ।

कन्या के इन सात वचनों के उत्तर में वर कहता है-
--- तुम अपने चित्त को मेरे चित्त के अनूकूल कर लो, मेरे कहे अनुसार चलना और मेरे धन को भोगना, पतिव्रता बन कर रहना तो मैं भी तुम्हारे सारे वचन निभाऊंगा. तुम गृह स्वामिनी बन कर सारे सुख भोगना ।
वर एक बार फिर कन्या से पांच वचन लेता है ----
मेरी आज्ञा के बिना, सोमपान, उद्यान ।
पितृघर या कहीं और, मुझको अपना मान ।।
जाओगी यदि तुम नहीं, बन कर मम अनूकूल ।
पतिव्रता बन न करो, मुझ से कुछ प्रतिकूल ।।
वामांगी तब ही तुम्हे मानूंगा कल्याणी
इसमें ही हित जानना नहीं तो निश्चित हानि ।।
ये वचन किसी को अपना दास बनाने के लिए बल्कि एक संतुलित, सुचारू गृहस्थी चलाने के लिए हैं और सातवें पद के बाद दोनों सखा भी तो बन जाते हैं.
इसके बाद धुव्र तारे के दर्शन कराए जाते हैं, धुव्र अपनी अटल भक्ति और दृढ़ निश्यच के लिए जाना जाता है --- वर वधु को धुव्र तारा दिखाता है और कहता है ----- तुम धुव्र तारे को देखो, वधु ध्रुव तारे को देख कर कहती है --- जैसे ध्रुव तारा अपनी परिधी में स्थिर रहता है, वैसे ही मैं भी अपने पति के घर में कुल में स्थिर रहूँ.
उसके बाद --- वर वधु को अरूंधती तारा दिखा कर कहता है --- हे वधु अरूंधती तारे को देखो.
वधु अंरूधति तारे को देख कर कहती है ---- हे अरूंधती, जिस तरह तू सदा वशिष्ठ (नक्षत्र) की परिचर्या में संलग्न रहती है, इसी प्रकार मैं भी अपने पति की सेवा में संलग्न रहूँ, संतानवती होकर सौ वर्ष तक अपने पति के साथ सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करूं.
और फिर आती हैस सबसे रोचक रस्म की बारी--
वर अपने दाएं हाथ से वधु के हृदय को स्पर्श करते हुए कहता हैं ---
---- मैं तुम्हारे, हृदय को अपने कर्मों के अनुकूल करता हूं, मेरे चित्त के अनुकूल तुम्हारा चित्त हो. मेरे कथन को एकाग्रचित् हो कर सुनना प्रजा का पालन करने वाले, ब्रह्मा जी ने तुम्हें मेरे लिए नियुक्त किया है.
आज पश्चिमी देश जब लिंग भेद की बात कर रहे हैं तो हमारे यहां हज़ारों साल पहले नारी और पुरूष को कितना बराबरी का अधिकार था. विवाह का एक एक वचन दोनों के बराबर के दर्जे की बात करता है. बल्कि वर वधु को अपना सर्वस्व दे रहा है. गृहस्थी को हमारे वेदों में सर्वश्रेष्ठ आश्रम माना गया है. विवाह केवल दो शरीरों का नहीं दो आत्माओं, दो परिवारों का मिलन है. सनातन संस्कृति के 16 संस्कारों में से एक अति महत्वपूर्ण संस्कार है. विवाह को दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन माना गया है, ऋग्वेद में वर वधु विवाह के समय भगवान से एक प्रार्थना करते हैं, जिसका हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार है ------

--- " विश्व के सृजनहार (ब्रह्मा जी), पालनहार (विष्णु जी) और संहारकर्ता (आदि देव महादेव) अपनी शक्ति से और विवाह मंडप में विराजमान देवता और अन्य विद्वान और महान गण अपने शुभ आशीष से हमारी (वर-वधु) आत्माओं और हृदयों का एकीकरण इस प्रकार कर दें, जैसे दो नदियों और दो पात्रों का जल परस्पर मिल कर एक हो जाता है. अर्थात जिस प्रकार गंगा और यमुना की पवित्र धाराओं का संगम होने पर विश्व की कोई शक्ति उन्हें अलग नहीं कर सकती, इसी प्रकार हमारी आत्माएं भी परस्पर मिल कर शरीर से पृथक होते हुए भी आत्मा और हृदय से एक हो जायें."

| विवाह सम्बन्धित कुछ उपयोगी बातें |जरूरी है विवाह का पंजीकरण | जन्म- कुण्डली मिलान क्यों ? | सात वचनों से बंधी है डोर | नववधू का सोलह श्रृंगार | सात शत्रु | पत्रिका मिलान आवश्यक नहीं | क्यों नहीं करना चाहिए एक ही गौत्र में विवाह? | महत्त्वपूर्ण है विवाह संस्कार | विवाह संस्कार कर्म | विवाह योग के कारक | विवाह योग | सुखी विवाह का विज्ञान | विवाह के उपाय | सप्तपदी | कन्यादान - शिक्षा एवं प्रेरणा | कन्यादान क्या, क्यों और किसे? |

Find US on

This Website is Developed by Saajan Verma "Sanjay"
© 2013-2014 www.SagaaiSeVidaaiTak.in. All Right Reserved.
Powered By :