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विवाह संस्कार कर्म

समावर्तन संस्कार के द्वारा बालक अपना ब्रह्मचर्याश्रम पूर्ण करता है। इसके पश्चात् उसे स्नातक की उपाधि दी जाती है। संस्कारों में विवाह संस्कार महत्वपूर्ण है। इससे व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होता है।
‘‘न गृहं गृहमित्याहु गृहिणी गृहमुच्यते।’’ इस वचन के आधार पर गृहस्थाश्रम के अंगरूप विवाह संस्कार की महत्ती आवश्यकता है। विवाह शब्द ‘वि’ उपसर्ग पूर्वक ‘वह्’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय करने पर बना है। जिसका अर्थ विशेष रूप से वहना है।
‘‘विशेष रूपेण वहते कन्याभारं इति विवाहः।’’
जीभूतवाहन के अनुसार विवाह का लक्षण–
‘‘युक्ति वरण विधानं अग्निद्विज साक्षिकं च पाणिग्रहण विवाहः।’’
विवाह संस्कार के तीन उद्देश्य देखे जा सकते हैं–
1. गृहस्थाश्रम में प्रवेश के लिए।
2. धर्म प्राप्ति के लिए।
3. वंश रक्षा एवं काम की प्राप्ति के लिए।

‘‘जायसमानों वै पुरुषः त्रिभिःऋणैः जायते’’ वचन के आधार से वेदाध्ययन के द्वारा ऋषि ऋण से पुत्र उत्पति एवं श्राद्ध प्रदान करने से पितृ ऋण से मुक्ति, द्रव्य एवं यज्ञ के द्वारा देव ऋण से मुक्ति प्राप्त होती है। इसीलिए विवाह संस्कार की आवश्यकता महत्वपूर्ण बताई गई है। विवाह में सपिण्ड, कन्या, मनोनयानानंदकारिणीस, सुलक्षण, यवीयसी, आरोगिणी कन्या से विवाह करना चाहिए। याज्ञवल्क्य ने कहा है कि–
अविप्लुत ब्रह्मचर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत्।
अनन्य पूर्विकां कान्तामसपिण्डा यवीयसीम्।।
अरोगिणीं भ्रातृयतीं असमानार्ष गोत्रणाम्।।
मनु के अनुसार
असपिण्डा च या मातृ असगोत्रा च या पितृः।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने।।

कन्या ग्रहण के विषय में मनु ने कहा है कि वह कन्या अधिक अंग वाली, वाचाल, पिंगल, वर्णवाली रोगिणी नहीं होनी चाहिए।
विवाह में सपिण्ड, विचार, गोत्र, प्रवर विचार करना चाहिए। विवाह में स्त्रियों के लिए गुरुबल तथा पुरुषों के लिए रविबल देख लेना चाहिए। कन्या एवं वर को चन्द्रबल श्रेष्ठ अर्थात् चौथा, आठवां, बारहवां, चन्द्रमा नहीं लेना चाहिए। गुरु तथा रवि भी चौथे, आठवें एवं बारहवें नहीं लेने चाहिए।
विवाह में मास ग्रहण के लिए व्यास ने कहा है कि माघ, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष, ज्येष्ठ, अषाढ़ महिनों में विवाह करने से कन्या सौभाग्यवती होती है।
रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मूल, स्वाति, मृगशिरा, मघा, अनुराधा, हस्त ये नक्षत्र विवाह में शुभ हैं। विवाह में सौरमास ग्रहण करना चाहिए। जैसे ज्योतिषशास्त्र में कहा है–
सौरो मासो विवाहादौ यज्ञादौ सावनः स्मतः।
आब्दिके पितृकार्ये च चान्द्रो मासः प्रशस्यते।।
बृहस्पति, शुक्र, बुद्ध और सोम इन वारों में विवाह करने से कन्या सौभाग्यवती होती है। विवाह में चतुर्दशी, नवमी इन तिथियों को त्याग देना चाहिए।
इस प्रकार आपको भी धार्मिक रीति से ही विवाह संस्कार को पूर्ण करना चाहिये।

(पं. कमल श्रीमालीजी द्वारा रचित पुस्तक ‘‘विवाह में बाधा’’ कारण और निवारण।) से...

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