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कन्यादान क्या, क्यों और किसे?

इंसानी जिंदगी में कन्यादान का सौभाग्य किस्मत वालों को ही प्राप्त होता है. कन्यादान सामान्य दान के समान नहीं है, इसका अर्थ बड़ा ही गहरा एवं महान है. कन्यादान का वास्तविक अर्थ है जिम्मेदारी को सुयोग्य हाथों में सोंपना. मतलब यह कि, अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा.

कन्या नये घर में जाकर परायेपन का अनुभव न करे, उसे प्रेम, अपनापन, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना चाहिये. कन्यादान का अर्थ यह नहीं कि जिस प्रकार कोई सम्पत्ति, किसी को बेची या दान कर दी जाती है, उसी प्रकार लड़की को भी एक सम्पत्ति समझकर किसी न किसी को चाहे जो उपयोग करने के लिए दे दिया है. हर मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता एवं स्थिति है. कोई मनुष्य किसी मनुष्य को बेच या दान नहीं कर सकता. फिर चाहे वह पिता ही क्यों न हो.

भावनाओं का मूर्त रूप-कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर संकल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं. वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों में पकड़कर, इस जिम्मेदारी को स्वीकार करता है. कन्या के रूप में अपनी पुत्री, वर को सौंपते हुए उसके माता-पिता अपने सारे अधिकार और उत्तरदायित्व भी को सौंपते हैं. कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा के अनुसार होंगे. कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने तथा पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्ति देवशक्तियाँ प्रदान कर रही हैं. इस भावना के साथ कन्यादान का संकल्प बोला जाता है. संकल्प पूरा होने पर संकल्प करने वाला कन्या के हाथ वर के हाथ में सौंप देता है, यही परंपरा कन्यादान कहलाती है.

द्वारा - सुशील शर्मा

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